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शान्ति पर्व
अध्याय २७०
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वृत्र उवाच
कालसञ्चोदिता जीवा मज्जन्ति नरकेऽवशाः |  १७   क
परिदृष्टानि सर्वाणि दिव्यान्याहुर्मनीषिणः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति