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शान्ति पर्व
अध्याय २७०
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वृत्र उवाच
क्षपय़ित्वा तु तं कालं गणितं कालचोदिताः |  १८   क
सावशेषेण कालेन सम्भवन्ति पुनः पुनः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति