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शान्ति पर्व
अध्याय २७०
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वृत्र उवाच
एवं संसरमाणानि जीवान्यहमदृष्टवान् |  २०   क
यथा कर्म तथा लाभ इति शास्त्रनिदर्शनम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति