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शान्ति पर्व
अध्याय २७०
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भीष्म उवाच
यथाञ्जनमय़ो वाय़ुः पुनर्मानःशिलं रजः |  ९   क
अनुप्रविश्य तद्वर्णो दृश्यते रञ्जय़न्दिशः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति