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वन पर्व
अध्याय २७०
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तं निहतं दृष्ट्वा धूम्राक्षं राक्षसोत्तमम् |  १५   क
हरय़ो जातविस्रम्भा जघ्नुरभ्येत्य सैनिकान् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति