वन पर्व  अध्याय २७०

मार्कण्डेय़ उवाच

स तय़ाभिहतो धीमान्गदय़ा भीमवेगय़ा |  २   क
नाकम्पत महावाहुर्हिमवानिव सुस्थिरः ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति