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वन पर्व
अध्याय २७०
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रवोध्य महता चैनं यत्नेनागतसाध्वसः |  २१   क
स्वस्थमासीनमव्यग्रं विनिद्रं राक्षसाधिपः |  २१   ख
ततोऽव्रवीद्दशग्रीवः कुम्भकर्णं महावलम् ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति