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वन पर्व
अध्याय २७०
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः प्रगृह्य विपुलां शतघण्टां विभीषणः |  ३   क
अभिमन्त्र्य महाशक्तिं चिक्षेपास्य शिरः प्रति ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति