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वन पर्व
अध्याय २७०
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मार्कण्डेय़ उवाच
पतन्त्या स तय़ा वेगाद्राक्षसोऽशनिनादय़ा |  ४   क
हृतोत्तमाङ्गो ददृशे वातरुग्ण इव द्रुमः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति