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वन पर्व
अध्याय २७०
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मार्कण्डेय़ उवाच
तं दृष्ट्वा निहतं सङ्ख्ये प्रहस्तं क्षणदाचरम् |  ५   क
अभिदुद्राव धूम्राक्षो वेगेन महता कपीन् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति