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शान्ति पर्व
अध्याय २७१
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भीष्म उवाच
स तत्र संहारविसर्गमेव; स्वकर्मजैर्वन्धनैः क्लिश्यमानः |  ४०   क
ततः स हारिद्रमुपैति वर्णं; संहारविक्षेपशते व्यतीते ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति