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शान्ति पर्व
अध्याय २७१
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भीष्म उवाच
सप्तैव संहारमुपप्लवानि; सम्भाव्य सन्तिष्ठति सिद्धलोके |  ५०   क
ततोऽव्ययं स्थानमनन्तमेति; देवस्य विष्णोरथ व्रह्मणश्च |  ५०   ख
शेषस्य चैवाथ नरस्य चैव; देवस्य विष्णोः परमस्य चैव ||  ५०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति