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शान्ति पर्व
अध्याय २७१
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भीष्म उवाच
प्रजाविसर्गं तु सशेषकालं; स्थानानि स्वान्येव सरन्ति जीवाः |  ५२   क
निःशेषाणां तत्पदं यान्ति चान्ते; सर्वापदा ये सदृशा मनुष्याः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति