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शान्ति पर्व
अध्याय २७१
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भीष्म उवाच
स यावदेवास्ति सशेषभुक्ते; प्रजाश्च देव्यौ च तथैव शुक्ले |  ५४   क
तावत्तदा तेषु विशुद्धभावः; संय़म्य पञ्चेन्द्रिय़रूपमेतत् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति