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शान्ति पर्व
अध्याय २७१
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युधिष्ठिर उवाच
वृत्रेण परमार्थज्ञ दृष्टा मन्येऽऽत्मनो गतिः |  ६४   क
शुभा तस्मात्स सुखितो न शोचति पितामह ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति