वन पर्व  अध्याय २७१

मार्कण्डेय़ उवाच

सोऽभिपत्य महावेगं रुक्मपुङ्खं महाशरम् |  ११   क
प्राहिणोत्कुम्भकर्णाय़ लक्ष्मणः परवीरहा ||  ११   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति