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वन पर्व
अध्याय २७१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तथा स भिन्नहृदय़ः समुत्सृज्य कपीश्वरम् |  १३   क
कुम्भकर्णो महेष्वासः प्रगृहीतशिलाय़ुधः |  १३   ख
अभिदुद्राव सौमित्रिमुद्यम्य महतीं शिलाम् ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति