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वन पर्व
अध्याय २७१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तं दृष्ट्वा वृत्रसङ्काशं कुम्भकर्णं तरस्विनम् |  १८   क
गतासुं पतितं भूमौ राक्षसाः प्राद्रवन्भय़ात् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति