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वन पर्व
अध्याय २७१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तमभ्येत्याशु हरय़ः परिवार्य समन्ततः |  २   क
अभ्यघ्नंश्च महाकाय़ैर्वहुभिर्जगतीरुहैः |  २   ख
करजैरतुदंश्चान्ये विहाय़ भय़मुत्तमम् ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति