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वन पर्व
अध्याय २७१
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मार्कण्डेय़ उवाच
महता शरवर्षेण राक्षसौ सोऽभ्यवर्षत |  २२   क
तौ चापि वीरौ सङ्क्रुद्धावुभौ तौ समवर्षताम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति