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उद्योग पर्व
अध्याय २२
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धृतराष्ट्र उवाच
नाहं क्वचित्सञ्जय़ पाण्डवानां; मिथ्यावृत्तिं काञ्चन जात्वपश्यम् |  ३   क
सर्वां श्रिय़ं ह्यात्मवीर्येण लव्ध्वा; पर्याकार्षुः पाण्डवा मह्यमेव ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति