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वन पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मय़ा त्र्यम्वको हरः |  ३   क
पिनाकी वरदो रूपी दृष्टः स्पृष्टश्च पाणिना ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति