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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः श्रुत्वा हतं सङ्ख्ये कुम्भकर्णं सहानुगम् |  १   क
प्रहस्तं च महेष्वासं धूम्राक्षं चातितेजसम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति