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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
तं लक्ष्मणोऽप्यभ्यधावत्प्रगृह्य सशरं धनुः |  १०   क
त्रासय़ंस्तलघोषेण सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति