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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
तमचिन्त्य प्रहारं स वलवान्वालिनः सुतः |  १७   क
ससर्जेन्द्रजितः क्रोधाच्छालस्कन्धममित्रजित् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति