वन पर्व  अध्याय २७२

मार्कण्डेय़ उवाच

ततो हताश्वात्प्रस्कन्द्य रथात्स हतसारथिः |  १९   क
तत्रैवान्तर्दधे राजन्माय़या रावणात्मजः ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति