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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तर्हितं विदित्वा तं वहुमाय़ं च राक्षसम् |  २०   क
रामस्तं देशमागम्य तत्सैन्यं पर्यरक्षत ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति