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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
तमदृश्यं विचिन्वन्तः सृजन्तमनिशं शरान् |  २४   क
हरय़ो विविशुर्व्योम प्रगृह्य महतीः शिलाः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति