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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
अन्तर्हितः प्रकाशो वा दिव्यैर्दत्तवरैः शरैः |  ४   क
जहि शत्रूनमित्रघ्न मम शस्त्रभृतां वर ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति