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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
रामलक्ष्मणसुग्रीवाः शरस्पर्शं न तेऽनघ |  ५   क
समर्थाः प्रतिसंसोढुं कुतस्तदनुय़ाय़िनः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति