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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
अकृता या प्रहस्तेन कुम्भकर्णेन चानघ |  ६   क
खरस्यापचितिः सङ्ख्ये तां गच्छस्व महाभुज ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति