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शान्ति पर्व
अध्याय २९१
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वसिष्ठ उवाच
सर्गप्रलय़धर्मिण्या असर्गप्रलय़ात्मकः |  ४०   क
गोचरे वर्तते नित्यं निर्गुणो गुणसञ्ज्ञकः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति