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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
तुषभक्षं तु मां ज्ञात्वा प्रविविक्तजने गृहे |  २३   क
विभ्रतं गार्दभं रूपमादिश्य परिगर्हसे ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति