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शान्ति पर्व
अध्याय २७३
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व्रह्महत्यो उवाच
प्रीते तु त्वय़ि धर्मज्ञ सर्वलोकेश्वरे प्रभो |  २५   क
शक्रादपगमिष्यामि निवासं तु विधत्स्व मे ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति