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शान्ति पर्व
अध्याय २७०
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वृत्र उवाच
कस्माद्भूतानि जीवन्ति प्रवर्तन्तेऽथ वा पुनः |  ३२   क
किं वा फलं परं प्राप्य जीवस्तिष्ठति शाश्वतः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति