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वन पर्व
अध्याय २१५
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मार्कण्डेय़ उवाच
विश्वामित्रश्चकारैतत्कर्म लोकहिताय़ वै |  ११   क
तस्मादृषिः कुमारस्य विश्वामित्रोऽभवत्प्रिय़ः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति