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शान्ति पर्व
अध्याय २७३
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भीष्म उवाच
गृध्रकङ्कवडाश्चैव वाचोऽमुञ्चन्सुदारुणाः |  ४   क
वृत्रस्योपरि संहृष्टाश्चक्रवत्परिवभ्रमुः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति