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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
अनुज्ञातस्त्वहं तेन तत्रैव समुपाविशम् |  ५३   क
प्रेक्षतश्चैव मे देवस्तत्रैवान्तरधीय़त ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति