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शान्ति पर्व
अध्याय २७३
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भीष्म उवाच
वृत्रस्य रुधिराच्चैव खुखुण्डाः पार्थ जज्ञिरे |  ५८   क
द्विजातिभिरभक्ष्यास्ते दीक्षितैश्च तपोधनैः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति