वन पर्व  अध्याय २७३

मार्कण्डेय़ उवाच

तथेति रामस्तद्वारि प्रतिगृह्याथ सत्कृतम् |  १२   क
चकार नेत्रय़ोः शौचं लक्ष्मणश्च महामनाः ||  १२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति