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वन पर्व
अध्याय २७३
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मार्कण्डेय़ उवाच
अकृताह्निकमेवैनं जिघांसुर्जितकाशिनम् |  १७   क
शरैर्जघान सङ्क्रुद्धः कृतसञ्ज्ञोऽथ लक्ष्मणः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति