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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
विचित्य दक्षिणामाशां सपर्वतवनाकराम् |  ३७   क
श्रान्ताः काले व्यतीते स्म दृष्टवन्तो महागुहाम् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति