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वन पर्व
अध्याय २७३
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्यासून्पावकस्पर्शैः सौमित्रिः पत्रिभिस्त्रिभिः |  २१   क
यथा निरहरद्वीरस्तन्मे निगदतः शृणु ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति