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वन पर्व
अध्याय २७३
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मार्कण्डेय़ उवाच
लङ्कां प्रवेशय़ामासुर्वाजिनस्तं रथं तदा |  २५   क
ददर्श रावणस्तं च रथं पुत्रविनाकृतम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति