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वन पर्व
अध्याय २७३
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवं वहुविधैर्वाक्यैरविन्ध्यो रावणं तदा |  ३२   क
क्रुद्धं संशमय़ामास जगृहे च स तद्वचः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति