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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
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संवर्त उवाच
भय़ं शक्राद्व्येतु ते राजसिंह; प्रणोत्स्येऽहं भय़मेतत्सुघोरम् |  ११   क
संस्तम्भिन्या विद्यया क्षिप्रमेव; मा भैस्त्वमस्माद्भव चापि प्रतीतः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति