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शान्ति पर्व
अध्याय २७४
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भीष्म उवाच
ततः स यज्ञो नृपते वध्यमानः समन्ततः |  ३४   क
आस्थाय़ मृगरूपं वै खमेवाभ्यपतत्तदा ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति