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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म धृष्टद्युम्नो महारथः |  १३८   क
इय़ेष वक्षो भेत्तुं च भारद्वाजस्य संय़ुगे ||  १३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति