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शान्ति पर्व
अध्याय २७४
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भीष्म उवाच
शृणु राजञ्ज्वरस्येह सम्भवं लोकविश्रुतम् |  ४   क
विस्तरं चास्य वक्ष्यामि यादृशं चैव भारत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति