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शान्ति पर्व
अध्याय २७४
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भीष्म उवाच
पुरा मेरोर्महाराज शृङ्गं त्रैलोक्यविश्रुतम् |  ५   क
ज्योतिष्कं नाम सावित्रं सर्वरत्नविभूषितम् |  ५   ख
अप्रमेय़मनाधृष्यं सर्वलोकेषु भारत ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति